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समकालीन युगधर्म से सम्पन्न एक काव्य-कृति “द्वापर गाथा” महाकाव्य |
-डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार
महाकाव्य साहित्य का सबसे बड़ी विधा है, जिसमें किसी एक महापुरुष का सम्पूर्ण जीवन-चरित्र उसकी समस्त शक्तियों और सीमाओं के साथ वर्णित होता है। एक महापुरुष के साथ उसके सभी समकालीन युगीन-संदर्भ भी जुड़े ही रहते हैं। इसलिए उस युग के देश-काल एवं वातावरण का भी परिचय हमें मिल जाता है। जिसमें महाभारत महाकाव्य तो अपने समकाल का एक विश्वकोष है ही, जिसके विषय में व्यास जी का यही दावा था, कि जो यहाँ पर नहीं है; वह कहीं पर भी नहीं है और जो कुछ इस काव्य में नहीं है; वह भारतवर्ष में नहीं है—
“यन्नेह नास्ति, तन्न नास्ति क्वचिद्
यन्न भारतः तन्न भारतमिति।।”
महाभारत के पात्रों को लेकर कितनी ही भारतीय भाषाओं में कितने ही खण्ड-काव्य और महाकाव्य भी रचे गये हैं। हिन्दी में ही मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्रत-वध’ तो रामधारी सिंह दिनकर का ‘रश्मिरथी’ खण्ड-काव्य प्रसिद्ध है। तो हरिऔध उपाध्याय का ‘प्रिय-प्रवास’ भी प्रसिद्ध है, महाकाव्य के रूप में। उसी प्रकार से हमें सम्प्रति एक ऐसी ही महाकाव्यी रचना का पूर्णतः पारायण करने का अवसर उपलब्ध हुआ है, जिसका नाम है— “द्वापर गाथा” महाकाव्य। इस महाकाव्य के रचयिता कवि का नाम है ध्रुव नारायण सिंह राई। जोकि बिहार (सपौल) के निवासी थे। उनके सुपुत्र ई. आलोक राई से यह कृति हमें मिली है। महाभारत की ही भाँति यह रचना भी तो अठारह सर्गों में विभक्त महाकाव्यी रचना ही है।
द्वापर युग को ही आधार बनाकर श्री धर्मवीर भारती ने ‘अंधायुग’ जैसा काव्य-नाटक रचा था। जिसमें कि केवल उस युग का शासक धृतराष्ट्र बस आँखों से ही अन्धा नहीं है अपितु वह विवेक-बुद्धि से भी वंचित ही है। अतएव महाभारत की ही एक सूक्ति ‘राजा कालस्य कारणम्’ के आधार पर वह सारा युग ही अन्धकारमय वर्तमान काल की ही भांति। आलोच्य कृति में युगीन परिवेश लगभग वैसा ही मिश्रित है।
कारण, द्रोपदी के चीर-हरण के अवसर पर भीष्म और द्रोण तथा कृपाचार्य जैसे बुद्धिजन एवं विवेकी व्यक्ति भी अपनी विवेक वर्तिका को बुझाकर निर्वाक् बैठे रहते हैं। तभी तो वहाँ पर एक नारी इतने सारे नरश्रेष्ठों के मध्य में भी निरवसन होकर निरीह बनी रहती है- जैसेकी रामायण की सीता को ही अग्नि-परीक्षा उतीर्ण करने के उपरान्त भी लोकापवाद का विवादित विषय बनना क्यों पड़ता है। उसी विषय में निम्नांकित पंक्तियाँ देखिए-
“कैसी दुधारी चाल/हर हालत में/सहना पड़े/नारी को(ही)/लोकापवाद(और)/रहना पड़े/प्रतीक्षा में/चरण-रज-स्पर्श की/बनकर जड़ पाषाण”
उपर्युक्त पंक्तियों में जगतजननी सीता से लेकर द्रोपदी (पांचाली) पर्यन्त अहल्या जैसी अभागिनी अनगिनत निरीह नारियों की व्यथा कथा बेबाक रूप से वर्णित की गई है। अतएव पितृ सत्तात्मक समाज की मूल्य दृष्टि उसके प्रति दोहरी ही सदैव से रही है। क्योंकि उसी का शील या सतीत्वहरण भी होता है और पुनः समाज में अधम एवं पतिता वनिता भी वही समझी जाती है-
“कदाचित्/सदा /सिद्ध करती रही/संस्कृति की विलक्षणता/सभ्यता की श्रेष्ठता/आज का द्वैत!/ माणदण्ड”
यह पाकिस्तानी कवयित्री प्रवीण शाकिर का सही कथन है कि-
“मैं सच बोलूँगी तो भी हार जाऊँगी,
वह झुठ बोलकर भी जीत जाएगा.”
कैसी विचित्र विधि-व्यवस्था की विडम्बना है कि एक रूपसी नारी बेचारी पुरुष-पुंगवों की भोग्या बनकर भी अपयश की ही पात्र बनती है। कारण, क्योंकि उसने एक तपोव्रती पुरुष प्रवर की तपस्या को जो भंग किया है-
“और/बनती है/माध्यम/मेनका/पुरुष का/भंग होती है किसी की तपस्या/उभय स्थितियों में स्त्रीलिंग-/ उपभोग्या (है)”
अर्थात् पुरुष-समाज, नारी का यौन-शोषण करके भी स्वयं अविकार एवं अच्युत ही बना रहता है और अपना दैहिक शोषण करारकर भी एक नारी अपयश की ही भोगभागी क्यों बनती है। वहीं यहाँ पर कवि की चिन्ता का गहनतम बिषय है।
कृत्य कुवारी निरीह नारी का शारीरिक शोषण तो उसको वहीं का भी नहीं रहने देता। कविवर ध्रुव नारायण सिंह राई ने इस विषय में कुमारी कुन्ती की वेदना को ही व्यक्त किया है-
“वसन-भूषण- श्रृंगार/रूपाकर्षण (है) निःसार/तन का संकोचन-उत्थापन;/मन का आलोड़-विलोड़न/सिहरन नस-नस में/सुलगन/नहीं यह वश में/क्या करूँ/ मैं क्वाँरी”
हालांकि नारी भी आखिर एक हाड़-मांस की मानवी ही है, अतः उसमें भी कामनाओं और भावनाओं का ज्वार उठता ही है। फिर सूर्य जैसा बलिष्ट देवपुरूष ने जब उसको बलाद् अपने अंग में भर ही लिया था तो वह कृत्य कुमारी कन्या कर भी क्या सकती थी। हमारे भारतीय समाज में बलातकृत् कन्या या कान्ताएँ कहीं की भी कहाँ रहती है। कारण, समाज में उनको अधम एवं परम पतिता-वनिता समझकर कोई परपुरुष अपनाता भी कहाँ है। स्वजन तो उसका उसका अपना कोई होता ही नहीं है।
कुमारी कन्याओं के साथ शारीरिक संसर्ग सुख लेकर और सन्तानोत्पति करके भी देवपुरुष तो फिर भी समाज में संपूजित ही बने रहे थे। नियोग की प्रथा में स्त्री केवल एक क्षेत्र मात्र ही थी जोकि सन्तान रुपी शस्यों को ही बस अवश भाव से उपजाती थीं। विवाह नामक संस्था में ही उसे कहीं आकर समुचित सम्मान सुलभ हुआ है। कुँवारी कन्याओं से समुत्पन्न सन्तानों को भी दैवी ही तो शास्त्रों में बताया गया है, जबकी वास्तव में देखा जाए तो इस महाकवि की दृष्टि में वह उन देवपुरुषों का स्वेच्छाचार और व्यभिचार ही था। बल्कि उन स्त्रियों के इच्छा के विरुद्ध शारीरिक सम्बन्ध स्यापित करना तो बलात्कार कर्म कोटि में ही आता है। व्यभिचार में भी कम से कम अवैध समबन्ध स्त्री-पुरुष के मध्य में भले ही होता है परन्तु उसमें उन दोनों की सहमति तो शामिल होती ही है। पुरुष समाज तो शारीरिक सम्बन्ध से यौनान्द और सन्तान सुख मिलता ही है-
“जब चाहो आहूत कर लो/तृषा मिटा लो/भस्मानंग कर डालो
ऐसी रस्में/ऐसे नाते/सदा चले हैं/निर्विध्न चला लो”
तथापि अवैध और अनैतिक रूपेण शारीरिक शोषण की शिकार ऐसी ही निरीह नारियों को ब्राह्मण धर्मशास्त्रकारों ने न जाने क्यों कर फिर भी पंचकन्याओं में ही स्थान दिया है। वे हैं- तारा-मन्दोदरी-पांचाली और अहिल्यादि। जिनमें उनकी सहमति के बिना भी उनके साथ पुरुषों ने शारीरिक संसर्ग स्थापित किया था। जब इस आर्यावर्त्त में नाना कुल-वंशों के व्यक्तियों के साथ शारीरिक सम्पर्क स्थपित करके सन्तानों की सृष्टी की है, तथापि ऐसे अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह-समबन्धों से समुत्पन्न सन्तानों की रक्तशुद्धता भी कहाँ अक्षुण्ण रही होगी-
“यूं/संकर/सब/कुल गोत्र वाले/राज्याश्रित/राजदण्ड उभय उत्कंठ/उद्धत-उदंड/वाह्य विनीत-मर्यादित/सभ्य संस्कृत।”
प्रस्तुत कृति के रचनाकार की दृष्टी में यह नियोग की प्रथा भी रक्त-मिश्रण का एक प्रमुख कारण रही है। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों की शास्त्रीय स्वीकृति आर्य एवं अनार्य रक्त के उन्मुक्त मिश्रण का ही तो परिणाम है, क्योंकि आव्रजक आर्यों ने स्ववंश वृद्धि के लिए ही वह विधि विहित विधान किया था।
नारी का ही एक नाम सीमन्ती भी है कि कही समाज की सारी नैतिक मर्यादाओं के भारी भार को सदा वहन करती है। भारत के भद्रवर्ग ने वैसे तो नारी-समाज की समस्त स्वतंत्रता छीनकर उसको घर-परिवार की संकुल सीमाओं में ही वन्दिनी बनाकर रख छोड़ा है। परन्तु जब किसी कुन्ती जैसी कमनीया कन्या के साथ उसकी इच्छा के बिना भी किसी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध स्थापित हो जाते हैं, तो उसी असूर्यपश्या सत्री के दुराचरण से सभ्य समाज की सारी ही मर्यादाएँ क्यों दरक उठती हैं-
“न रहो/धिसीपिटी मर्यादा में/तरुणी असूर्यंपश्या/न रहो”
कामभाव को धर्माचार्यों ने पाप-पुण्य की नैतिकता से जोड़कर उसको प्रेम से परे ही रखा है। जबकि अन्ततः प्रगाढ प्रणय प्रकर्ष ही तो कामभाव की अन्तिम परिणति होती है। परन्तु निरीह नारियों का प्रेम भी पुरुष सत्तात्मक समाज की दृष्टी में विषैली वासना का ही विषय क्यों बन जाता है-
“प्रेम उद्दात भावना/प्रेम न वाम वर्जना/प्रेम नैसर्गिक कामना/प्रेम प्रखर सरिता-धारा/सुष्टु सुन्दर सर्जना/पारस्परिक अवगाहना।”
अतएव प्रेम, एक मानव मन का मधुर-मनोहर मनोभाव ही तो है। जोकि दो विषमलिंगियों को भी काम-भाव से ही सही, कम से कम उन्हें स्नेह-सूत्र में तो बाँधता ही है। बल्कि शतपथ-ब्राह्मण में तो इस संसार की सृष्टि ही काममय बताई गई है- काम भयं इयं जगत्। कामिनोदपि रहस्याख्यानं ब्याज चुम्बनेव प्रधानम्। कहकर काम किंवा प्रेम भाव की अपरिहार्यता को ही शास्त्र-सूत्रकारों ने प्रतिपादित किया है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने तभी तो अपने महाकाव्य का ही नाम श्रद्धा की बजाय ‘कामायनी’ ही रखा है। जहाँ पर वे सर्ग-संरचना के पीछे भी कामभाव और प्रेम-पाश को ही देखते हैं-
“यह सर्ग इच्छा का है परिणाम्
हमी बनाते हैं यहाँ उसे छविधाम”
हमसे यहाँ पर तात्पर्य स्त्री एवं पुरुष के स्नेहिल शारीरिक संसर्ग से है।
‘द्वापर गाथा’ एक नारी चरित्र प्रधान रचना भी है। अतएव द्रोपदी रूपी नारी का अस्तित्व और उसकी अस्मिता ही कहीं उसके केन्द्र में है। फिर भी वह अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए सतत संधर्ष भी करती है और दुर्योधन तथा दुशासन जैसे दुराचारी और अभिमानी पुरुषों से होने वाले अपने अपमान का पूणतः प्रतिशोधन भी वह करती ही है। अतएव वह धर्माचार्यों द्वारा निर्मित निरीह एवं निर्बल नारी कहाँ है- सीता और सावित्री या अहिल्या की ही भाँति। अपितु वह कहीं न कहीं आधुनिक युगीन नई नारी के ही निकट है जोकि अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेष्ट भी है।
हालांकि नारी मात्र की पूर्णता मातृत्व में ही निहित है, इसीलिए वह केवल भोग्या पत्नी या प्रेयसी बनकर ही संतुष्ट कहाँ रहती है। बल्कि सन्तान का सुखद अनुभव पाकर ही वह पूर्णता को प्राप्त होती है-
“सूनी माँग/सँवरी–सँवरी लगती लकदकउसपर लाली।/ क्वारीं पर/सौभाग्यवती/कुक्षअमियरसपूर्ण हुआ/सूत्र जीवन/सम्पूर्ण हुआ।”
उसके सौन्दर्य-संभार और यौवन के उभार की भी सार्थकता इसी में है कि वह सन्तान के सुख का आनन्द अनुभव अबाध और अनवरत भाव से ही करे-
“गदराये/परस-पादप/झरने लगे बौर/दिखने लगे टिकोले/बन रहे रसाल-/ संतुष्टि मातृत्व की।”
अतएव नारी जीवन की सम्पूर्णता और सुख केवल पत्नीत्व में ही नहीं निहित है। अपितु मातृत्व ही उसे सम्पूर्ण सुख और सम्मान भी देता है। भले ही परिवार नामक संस्था में उसका शारीरिक शोषण और दारूण दोहन भी होता है परन्तु उसी में वह समस्त सुरक्षा का भी सुखद अनुभव करती है। तो वही कुलवधू बनकर वह माता और सास एवं दादी तक का सम्मान पाती है जोकि वैवाहिक और दाम्पत्य सम्बन्धों में बंधे सर्वथा सुलभ कहाँ है।
जब अपने आर्यावर्त देश में बीसियों जातियों का प्रवजन और प्रवास हुआ है तो फिर यहाँ रक्त-वर्ण की शुद्धता और अशुद्धता का प्रश्न उठाना कहाँ तक समुचित है। उसमें भी जन्म और कुल की श्रेष्ठता को वर्ण-वयवस्था के विचार से सिद्ध करना कौन सी मतिमानी है। रविन्द्रनाथ टैगौर ने भी अपने ‘गोरा’ नामक उपन्यास में इस समस्या को उठाया है जो गिरीश कर्णाट ने भी अपने ‘संस्कार’ जैसे नाटक में इसी मुद्दे को शिद्दत के साथ उठाया है। महाभारत में भी कर्ण जैसा पात्र की कुलीनता और अकुलीनता को लेकर पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ है। क्योंकि केवल निम्न वर्ग सूत या शूद्र कुल में पलने के ही कारण कर्ण को धर्नुविद्या की परीक्षा में प्रविष्ट द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे ब्रह्मणवादियों ने नहीं होने दिया था। उसी अवसर पर महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई ने अपने प्रस्तुत ‘द्वापर गाथा’ महाकाव्य के पात्र कर्ण के मुख से वर्ण-व्यवस्था का यही कहलवाकर प्रतिवाद कराया गया है- “पूछते/कुल गोत्र/जाति-नाम/पात्रता का/प्रतिमा का/आर्यत्व का/आचार्य कृप तुम कौन? भीष्म,विदूर,द्रोण/सबके सब मौन/मौन,/संपूर्णकुरू सभा।” केवल तथाकथित दासीपुत्र विदूर की ही विवेक वर्तिका। उस सभा स्थल पर पूर्णतया प्रदीप्त थी।
द्वापर का कर्ण जन्मजात जाति व्यवस्था किवा वर्ण-विधान का कायल कहाँ है अपितु वह तो स्वयं भीष्म और द्रोण तथा कृपाचार्य से इस विषय में प्रश्न पूछता है कि योग्यता अथवा प्रतिभा का आखिर इस जन्मजात योग्यता से सम्बन्ध भी क्या है। बल्कि एक संस्कृत के कवि ने तो कर्ण से यहाँ तक भी कहलवाया है-
सूतो वा सूत पुत्रोऽहंम् यो वा को वा भवाम्यहम्।
देवायत्तं कुलेजनम मदायत्तंम तु पौरूसम्।।
(वर्णीसंहार नाटक)
अर्थात मैं सूत हूँ या सूत-पुत्र हूँ ; इसका मतलब क्या है ; वह तो देवाधीन ही है। परन्तु मेरे वश में तो केवल मेरा पुरूषार्थ ही है ; उसे दिखाने का उन्मुक्त अवसर मुझे मिलना ही चाहिए। फिर यदि उसका अपना जन्म किसी निम्नकुल में या कुमारी कुन्ती के गर्भ से भी हुआ है तो उसमें उसका क्या दोष है। यह कहाँ का न्याय है कि ‘करे कोई और भरे और‘ इस विषय में तो द्वापर का कर्ण अपनी जन्मदात्री कुन्ती को भी कहाँ क्षमा करता है। अपितु वह उसे भी खूब खरी-खोटी सुनाता है कि उसने अपनी कुलीनता को तो बचा लिया है, परन्तु उसे निम्नता के गर्त में धकेल दिया था।
दुर्योधन इस विषय में पुनरपि समतावादी राजपुरुष है क्योंकि उसी ने कर्ण को अपना अभिन्न मित्र बनाकर उसे अंगराज भी तो बनाया था। तब ब्रह्माणों द्वारा बनाई वर्णव्यवस्था कहाँ चली गई थी। इस प्रकार से शासन-विधानों की मान्यता शास्त्रीय विधानों पर भारी ही है। कर्ण, केवल राज्याश्रय के अभाव में ही तो अपनी निम्न कुलीयता का दंड भोग रहा था। इसी कारण स्वतंत्र भारतवर्ष में जब से और जैसे ही शासन-विधान के अनुसार ‘अस्पृश्यता निवारण अधिनियम 1956 ई.’ बना है ; तभी से छुआछुत का भेदभाव कानूनी अपराध भी घोषित कर दिया गया है। अतएव राजसत्ता धर्मसत्ता से कहीं अधिक प्रबल प्रभावी होती है। कुन्ती केवल अपनी कुलीनता की रक्षार्थ ही स्वसंतान का त्याग कर देती है, क्योंकि कृत्य कुमारी रहकर वह सन्तति-सृजन कर भी कैसे सकती थी। कारण, सवर्ण समाज में वैसा प्रकट करके वही कलंकित भी होती। अब उसके दुष्कृत्य अथवा दुराचार का दण्ड कर्ण ही हेयकुलता का दण्ड भोग रहा है। महाकवि ने यहाँ पर कर्ण के मुख से यही आडम्बर प्रश्न उठवाया है-
“कहे/कर्ण को कौन्तेय/किसमें ऐसा साहस है/छीछालेदार होता/पुत्रवधू का/(होती)अपमानित/मोहन की फुआ/खुल जाता/चारित्रिक पोल/(तब) रवि न सकता/कुछ बोल।”
इस प्रकार से जन्मजात जाति व्यवस्था पर प्रस्तुत पुस्तक में करारा कशाघात ही किया गया है जोकि यहां पर सन्दर्भ सापेक्ष भी है ही। क्योंकि कौरव और पांडव जैसे, राजवंश भी तो स्वयं संकर रक्त-वंशज ही थे। अतएव रक्त वर्ण-वंशज किवा वंश की शुद्धता और उच्चता को उचिततया ही यहाँ पर प्रश्नांकित किया गया है। श्री कृष्ण का आप्त आचरण भी यहाँ पर प्रश्नांकित है।
द्रोपदी, कर्ण और विदुर ये तीनों ही मात्र महाभारत महाकाव्य के अनवरत अभिशप्त ही रहे हैं। यदि द्रोपदी को जुए के दाव में लगाकर भी युद्धिष्ठिर धर्मराज ही कहला सकते हैं तो उस समाज की सभ्यता कैसी रही होगी। इसी प्रकार से कर्ण और एकलव्य की व्यक्तिगत योग्यता और प्रतिभा का केवल जन्मजात हेयता के आधार पर ही उन्हें अवसरों का समानता से ही वंचित वर्ण विधान में रखा गया है। अतएव वर्ण व्यवस्था स्वयं में एक समता-विरोधी विषमता–वर्धन सामाजिक संरचना ही है। अतः महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई ने अपनी महाकाव्यात्मक रचना में भी वर्तमान में चल रहे अस्मिता-विमर्श को जो उठाया है; वह सामीचीन ही तो है। हालांकि कुलीनता किंवा राजन्यता की कसक कहीं न कहीं कर्ण के अर्न्तमन में यहाँ पर कसमसा भी रही है जोकि मानव प्रकृति के ही अनुकूल आचरण ही है। नारी ही यहाँ पर सौन्दर्य और संवेदना की सतत सोतस्विनी हैं तो प्रेम की भी पयस्विनी भी तो वही है। कहीं-कहीं पर प्राकृतिक परिवेश का मनोहारी वर्णन भी इस काव्य में मनोहरी है। अतएव अवश्मेव पठनीय है।
इस महाकाव्य में हमें केवल दो ही बातें खटकती हैं। एक तो यह काव्य रचना यदि छन्दोबद्ध होती तो कितनी सरस और रस-सिक्त एवं सुन्दर होतीं। दूसरी, इसमें छोटे-छोट सर्गों की जो भरमार की गई है, उसके स्थान पर बड़े-बड़े पन्द्रह से बीस तक के पृष्ठों के ही केवल दस या बारह ही पर्याप्त रहते। हालाकि इस महाकाव्य की अपनी भाषा भी संस्कृतनिष्ट और विषय और भावों की ही अनुवर्ती है। छन्द-मुक्त होकर भी इस काव्य की पंक्तियों में एक प्रकार की अर्न्तलय भी विधमान है. कहीं-कहीं पर बौद्धिक विमर्श भी भावबोध पर भारी है। तथापि भावात्मक संवेग के ही साथ-साथ ज्ञानात्मक संवेग का समुचित समायोजन ही श्री ध्रुव नारायण सिंह राई ने यहाँ पर किया है।
इस महाकाव्य का यह दूसरा और संशोधित संस्करण ही है। प्रथम संस्करण 2012 ई. में ही प्रकाशित हुआ था। उनके सुपुत्र श्री आलोक राई उनकी तीन-तीन काव्य रचनाओं को एक ही साथ स्वराज प्रकाशन से कराकर पितृऋण से उऋण होने का इसी ब्याज से ही सही उचित उपक्रम ही किया है। खगेन्द्र ठाकुर ने प्रथम संस्करण की विस्तृत प्रस्तावना लिथी थी तो दूसरी परिवर्धित संस्करण की भूमिका भी सुधी समालोचक श्री युगल किशोर प्रसाद ने सारगर्भित लिखी है। अतः बिहार पूर्वी सीमान्त पर अवस्थित सुपौल जैसा जिला भी हिन्दी की साहित्य सर्जना के लिए अत्यन्त उर्वर ही सिद्ध हुआ है। सामाजिक-न्याय की मांग तो वहाँ के प्रत्येक रचनाकारों की रग-रग में ही समायी हुई है।
सम्पर्क-सूत्रः
डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार सेवानिवृत प्राध्यापक,
गो.ग.द.स. स्नाकोत्तर कालेज, पलवल (हरियाणा) 121102
पताः 40/1 गाँधी आश्रम कालोनी, पलवल-121102,
जिला-पलवल (हरियाणा) मो.-9991816926
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पुस्तक का नामः “द्वापर गाथा” महाकाव्य
रचनाकार का नामः श्री ध्रुव नारायण सिंह राई
प्रकाशन का नामः स्वराज प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली
पृष्ठ संख्याः 192 मुल्य राशिः 200/-
जनसंस्करण पेपर बैक बाईडिंग में है।
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"Dwapar Gatha" Mahakavya By Dhruva Narayan Singh Rai |
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आप कहाँ चले गए महाकवि! -विष्णु एस राई
ध्रुव नारायण सिंह राई जी की कविता अभाव
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