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Thursday, September 1, 2022

‘द्वापर गाथा’ महाकाव्य का काव्य-प्रसंग - डॉ. विनय कुमार चौधरी

 काव्य-प्रसंग

"द्वापर गाथा" महाकाव्य (2012)


कोशी अंचल की एक अदम्य प्रतिभा का नाम है -ध्रुव नारायण सिंह राई। राई जी के भीतर सागर-सी अनुभूति-प्रवणता और पहाड़ जैसी अभिव्यक्ति-आकुलता है। संवेदना-समृद्ध होने के कारण ही वे मूलतः कवि हैं और विशेषतः प्रबंधकार। यद्यपि निबंधकार और आलोचक के रूप में भी उनके प्रयास मौजूद हैं ; लेकिन यह उनका अतिरिक्त कुछ है। वस्तुतः कविता ही उनकी आत्म-भाषा है।

पाठकीय संवेदना को झकझोरने में पूर्णतः सक्षम ‘अँगूठा बोलता है’ कवि राई की प्रथम और सफल प्रबंध कृति है जिसमें उन्होंने द्वापर की कथा कही ही है, लेकिन वे अपने आपको दलित-द्राक्षा बनाकर भी उतना नहीं उड़ेल सके, जितना और जिस रूप में चाहते थे। उनकी असंतुष्टि घनीभूत होकर अन्ततः इस दूसरे काव्य ‘द्वापर गाथा’ में प्रस्फुटित हुई। ‘द्वापर गाथा’ काव्य संतोषजनक ही नहीं, सफल एवं सराहनीय प्रयास है। अठारह सर्गों में निबद्ध यह काव्य राई को सिद्ध कवि और सक्षम प्रबंधकार प्रमाणित करने में समर्थ है। जिस द्वापर काल में युधिष्ठिर, अर्जुन, कृष्ण जैसे चरित्र हुए, महाभारत जैसी युगान्तरकारी घटना हुई और जिस युग का ‘अभ्युत्थानाय ..................... ’ कहकर गौरव-गान किया जाता रहा है, आदर्श के कथित मानक उस युग में भी विकृतियाँ एवं विरूपताएँ विद्यमान थीं, लेकिन सामाजिक-रानीतिक विद्रूपताओं के कुत्सित चित्रों का गुप्त अलबम, सार्वजनिक करने का साहसिक प्रयास अब तक बहुत कम रचनाकारों ने किया है। कवि राई उन विरले साहसी रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने ‘द्वापर गाथा’ को तद्युगीन नग्नता का बोलता हुआ एक आईना बना दिया  है।

लेकिन ‘द्वापर गाथा’ रूपी आईना उस युग को चिढ़ाने के लिए नहीं लिखा गया है, अपितु अपने समय और समाज को भी झाँकने और आँकने के लिए गढ़ा गया है। स्वयं कवि के शब्दों में - ‘‘अठारह सर्गों में निबद्ध यह महाकाव्य ‘द्वापर गाथा’ के मिस युग-युगों की गाथा है, जो उसके छद्मों को उजागर करता है।’’ कवि ने हिरोशिमा, नागाशाकी यहाँ तक कि खाड़ी युद्ध का शब्दशः उल्लेख करके द्वापर युग से अद्यतन को दृष्टि-दायरे में रखने का संकेत किया है।

                प्रस्तुत काव्य में द्वापर युगीन कथा का निरूपण अथवा तद्युगीन चरित्रों का चित्रण करना कवि का अभिप्रेत नहीं है। अगर ऐसा होता तो कथा-धारा अधिक सशक्त एवं प्रवाहपूर्ण होती। लेकिन अठारह सर्गों के व्यास-विस्तार में भी ‘द्वापर गाथा’ में न तो कोई प्रधान एवं सुशृंखलित कथा है और न ही कोई केन्द्रीय चरित्र। प्रबन्ध-काव्य के शास्त्रीय निकष के अनुरूप न होने के बावजूद ‘द्वापर गाथा’ की प्रबंधात्मकता असंदिग्ध है।

इस काव्य में द्वापर युग की कथा के बहाने समकालीन राष्ट्रीय समाज के खोटे सिक्कों के अनुचित प्रचलन को पहचान के दायरे में लाना और लघुजनों/श्रमजीवियों को समझ-सक्षम बनाना है, ताकि वे अपने युगनायकों के प्रति सही सलूक निर्धारित कर सकें। कवि के शब्दों में - 

‘व्यापार/फल-फूल रहा/खोटे सिक्कों का।’

‘द्वापर गाथा’ में कथा नहीं, कथा-आलोचन है। यह कथा नहीं है, क्योंकि कवि अपने पाठक-स्तर को इस योग्य मानता है कि द्वापर की कथा उसकी अन्तश्चेतना में पूर्व से ही विद्यमान है, जिसे संकेत-बटनों को दबाने मात्र से ही गतिशील किया जा सकता है। ये संकेत-बटन और कुछ नहीं कवि की संशोधक दृष्टि से उगे आलोच्य-बिन्दु हैं।

भावना, कल्पना, बुद्धि और शैली के संतुलित संयोग से ही श्रेष्ठ काव्य की सृष्टि संभव है। ‘द्वापर गाथा’ में कवि की भावना अवाम का पक्षधर बनकर उमड़ी है, दलित-चेतना का उभाड़ विस्फोटक रूप में व्यंजित है जिसमें कल्पना की संतरंगी आभा की दीप्ति भी है और वह मुक्त छन्द की आधुनिक शैली में अभिव्यंजित हुई है। बुद्धि तत्त्व के रूप में कवि की उच्च शिक्षाजनित ज्ञान-बुद्धि है, जो सजग आलोचक की तरह सदैव तत्पर है। ज्ञानात्मक अनुभूति का अकुंठ विस्फोट है- ‘द्वापर गाथा’। मानव सभ्यता के विकास को विनाश के गर्त्त में धकेल देने की मानवीय भूल का ही दूसरा नाम है - ‘महाभारत’ का युद्ध और इस भूल के लिए जिम्मेदार युग का नाम है- ‘द्वापर। सभ्यता-विनाश के लिए जवाबदेह उस ऐतिहासिक भूल की ही आवृत्ति-पुनरावृत्ति बीसवीं शती के प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुई। ऐसी विनाशक प्रवृत्ति रखने वाले, विध्वंसक परिस्थिति उत्पन्न करने वाले मानवताघाती तत्त्वों को धर्मवीर भारती ‘अंधा युग’ के कटघरे में खड़ा करते हैं, तो रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘कुरुक्षेत्र’ में - ‘‘वह कौन रोता है वहाँ इतिहास के अध्याय पर ?’’ कहकर पाश्चाताप प्रेरित करते हैं। परम्परा की उसी कड़ी में कवि राई भी हैं जो सभ्यता-विकासजनित  वैज्ञानिक इजादों के दुरुपयोग पर ध्यानाकर्षण का प्रयास करते हैं- ‘‘लोंगो ने/क्यों किया/अपना हाल बेहाल/गलत इस्तेमाल/साधना- तपस्या का/कला-कुशलता/वर ज्ञान और विज्ञान का ?’’

‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्यवचनम् द्वयम्’ की भाँति अठारह सर्ग-पुराणों वाले ‘द्वापर गाथा’ काव्य में व्यास कवि राई ने निष्कर्षात्मक रूप से दो बातें कहीं हैं: एक तो यह कि राजा जैसे शीर्ष पद का अधिकारी होना बड़ी बात होकर भी बड़ी नहीं है अगर उसके पार्श्व में विपन्नता क्रन्दन कर रही हो और दूसरी बात कि आदमीयत से युक्त आदमी ही वरेण्य है - ‘‘राजा होना/बड़ी बात है/बड़ा होना/सबकुछ नहीं।/सम्पन्नता से क्या होता/बगल विपन्नता विलक रही?/शक्ति सुरक्षा देकर ही/सचमुच होती शक्ति/व्यक्ति सरल होकर ही/पा सकता है भक्ति।/कोई कुछ न रहे तब भी/कुछ अन्तर न आता कोई/आवश्यकता आज इतनी ही/कि आदमी रहे आदमी।’’

डाॅ. विनय कुमार चौधरी
04/05/2003
सनातकोत्तर हिन्दी विभाग
बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा
मो. 94306 62812



                                                



                                          
                                        
                                
                                            

               


  संक्षिप्त परिचय


प्रो. डॉ. विनय कुमार चौधरी


कृतियाँ -

1. प्रबंधात्मक - चित्रकूट की अवसयात्रा (1997/2015), 

कोसीपुत्र (1998, 2019), 

दलित द्रौपदी के करतार (2004), 

जिंदा तुम्हे कबीर मिलेगा ( 2007/2016), 

सुनअ हो भैया लोक जहान (2007), 

ओ संसद के पाषाण सुनो (2019), 

नमो नमो (2021), भारत म का संदेश(2010), 

यह भागता सहर है (2017)


2. कविता संग्रह - सखि वे कुछ वेतन भी पाते (2000), 

बाबा सिंहेश्वर (2005), 

कैप्सूल कविताएं (2010), 

आओ हम कुछ लक्ष्य बनाएँ (2012), 

अटपटी चटपटी कविताएँ (2017), 

जब हम उदास होते हैं(2017), 

यादों के झरोखे (2017), 

कोसी अंचल में फिर बाद आए (2017), 

शेष अशेष (2017)


3. गजल एवं गीत संग्रह - हो गई है जिंदगी ही शकुंतला (2017), 

रूह की आवाज सुनो (2017), 

जबसे तुमको देखा है (2019), 

ये मेरे गीत उनके लिए (2010), 

हमारा है कारगिल (2010)


4. नाटक - कालेज उद्योग (2013), 

दधीचि की हड्डी (2016)


5. अकादमिक - स्नातक हिंदी रचना (2003), 

पत्रकारिता के सैद्धांतिक आयाम (2005), 

प्रयोजनमूलक हिन्दी : विविध संदर्भ (2007), 

प्रयोजनमूलक हिन्दी एवं पत्र कारिता के नए परिपेक्ष्य (2007), 


6. शोध ग्रन्थ - कोसी अंचल का साहित्यिक अवदान (2010), 

कोसी अंचल के लोकगीतों का समाजशास्त्रीय अध्ययन (2010), 

बिहार की लोक गाथाएँ (2018), 

कोसी अंचल के लोकसहित्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन (2015), 

चन्द्र किशोर जायसवाल का रचना संसार (2015), 

कोसी अंचल का लोक साहित्य (2018), 

श्यामसुन्दर घोष की काव्य प्रकृति (2017)


संपादन - शोध सिद्धांत एवं व्यवहार (2020), 

समकालीन हिंदी कविताएं (2021), 

सदी के पार की गजले ( 2007), 

रेणु समकाल (2012), 

कोशी शोध सृजन - (अर्ध वार्षिक/ 2010 से अद्यतन/ ISSN: 2230 - 8636)


पुरस्कार - साहित्य साधना (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद), 

डॉ. राम प्रसाद सिंह साहित्य पुरस्कार (गया), 

कोसी गौरव (सर्वोदय समाज, कटिहार), 

भारतीय साहित्यकार संसद समस्तीपुर आदि दर्जनाधिक सम्मान।

संपर्क सूत्र - मो. - +91 94306 62812


(श्रोत- द्वापर गाथा महाकाव्य,  2012)

द्वापर गाथा 
महाकाव्य

ध्रुव नारायण सिंह राई
2012




द्वापर गाथा महाकाव्य ध्रुव नारायण सिंह राई
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द्वापर गाथा
महाकाव्य
ध्रुव नारायण सिंह राई
स्वराज प्रकाशन




डाॅ. विनय कुमार चौधरी जी की कुछ पुस्तकों के छायाचित्र
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द्वापर गाथा महाकाव्य, 2012 का जीवन-मूल्य, युगल किशोर प्रसाद

अँगूठा बोलता है खण्डकाव्य ध्रुव नारायण सिंह राई द्वारा रचित की कुछ पंक्तियाँ

कभी ना सर झुकाया मुश्किलों के सामने-ध्रुव नारायण सिंह राई की ग़ज़ल

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Friday, August 12, 2022

पिता महाकवि की यादें (पिता ध्रुव नारायण सिंह राई जी के स्मरण में)-ई. आलोक राई

 

जन लेखक संध की केन्द्रीय पत्रिका अंक 2022, 
जन आकांक्षा

ई. आलोक राई
शिक्षा- बी.टेक.
इन मैकेनिकल इंजीनियरिंग,
पॉलिटेक्निक, 
बी.एड.  










पिता महाकवि की यादें

(पिता ध्रुव नारायण सिंह राई जी के स्मरण में)

 

बैठा मैं

यूं चिंतन मनन में

वो छोड़ गये बीच मजधार मुझे

खोज रहा हूँ किनारा।

छू के गई

पवन के वेग-सा अंतर्मन

उनकी बातें उनका साथ

एक उर्जा एक एहसास।

मैं हूँ आज उनकी यादों के पास

अनुगूँज उनकी बातों की

उनके कर्मों का प्रभाव

झकझोर रहा मूझे मन-मन।

वे मददगार लोगों के

दया थी उनमें भरमार

ना धन संचय, ना चिंता भविष्य की

बस करते करते कभी ना रूकते

हर क्षेत्र को ढकते

सुना बहुतों से ये सारी बातें

आज दिख रहा कर्मों की झंकार।

उनका साहित्य प्रेम रहा छलक

द्वापर गाथा महाकाव्य

बंद नेत्र खोल रहा है

आज भी अँगूठा बोल रहा है

टुकड़ा-टुकड़ा सच खोल रहा है

ग़ज़लें बयाँ कर रहीं है दिलों को

मधुर गीत मधु जीवन में घोल रहा है

समय अपने वेग से सरक रहा है

मैं आज भी उनसे रहा सीख।

मन तरंगित हो आज

बैठा मैं

यूं चिंतन मन में

दो शब्दों से कुछ बातें बोल रहा।

 

जन आकांक्षा, जन लेखक संध की केन्द्रीय पत्रिका अंक 2022 में छपि मेरी कविता जिसे मैं अपने पिताजी को समर्पित किया है और जन आकांक्षा पत्रिका के संपादन समूह को मेरा धन्यवाद है। और आप सभी को धन्यवाद तथा आशा करता हूँ आपका मेरे प्रति प्यार और स्नेह बना रहे।

जन आकांक्षा
जन लेखक संध की केन्द्रीय पत्रिका अंक 2022

Wednesday, March 2, 2022

युगल किशोर प्रसाद / द्वापर गाथा (महाकाव्य), 2012 का जीवन-मूल्य

द्वापर गाथा (महाकाव्य), 2012

जीवन-मूल्य

‘‘द्वापर गाथा‘‘ के रचयिता महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई ने द्वापर युगीन महतादर्शों की आड़ में हुए दुष्कृत्यों और उन्हें अंजाम देनेवाले भीष्म, विदुर, धर्मराज युधिष्ठिर जैसे महानता ओढ़े महत् चरित्रों के खोखलेपन को उजागर कर अपनी यथार्थपरक जीवन-दृष्टि एवं युग-धर्मिता का परिचय दिया है। इसमें पौराणिक कथा और परम्परा को उतना ही स्वीकार किया गया है जितना आधुनिक विचारशीलता और तर्क-बुद्धि के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता है। इस रचना में सही सोच के संदर्भ में ही मनुष्य के भावों, विचारों और अनुभूतियों को अभिव्यक्ति मिली है। कवि कामायनीकार की तरह सक्षम प्रतीत होता है।

            प्रस्तुत महाकाव्य में महाभारत-कथा उसी रूप में विद्यमान है जैसे तीर्थराज प्रयाग की पावन त्रिवेणी में गंगा-यमुना के साथ अन्तःसलिला सरस्वती। महाकवि का उद्देश्य द्वापर युग की कथा को दुहराना कतई नहीं है, उनका महत् उद्देश्य तो तद्युगीन विद्रूपताओं, उच्छृंखलताओं, नैतिक मूल्यों के ह्रास, स्वार्थान्धता, जीवन-मूल्यों के विघटन आदि जिन कारकों से महासमर की पृष्ठभूमि बनी, उनका चित्रणकर तद्युगीन धटनाओं को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर एक नवीन महाकाव्य के सृजन का श्रेय लेना है। कवि यूँ तो श्रेय के लिए नहीं लिखता है किन्तु उसकी विलक्षण और अनुपम प्रस्तुति उसे श्रेय देकर रहती है। राईजी के अनुपम, अनूठे प्रयास को जीवन-मूल्यों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने-परखने की जरूरत है।

          विवेक सम्मत विचारों के साथ-साथ प्रस्तुत रचना का भाषिक सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। प्रतिपादित विचार मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। यह भाषा का कमाल है। ये भाषा को शब्दों में न बाँधकर शब्दों की नाड़ी पकड़ते हैं, और उन्हे उचित स्थान पर प्रयुक्त करते हैं। उनका यही गुण उन्हे श्रेष्ठ साहित्यकार की प्रतिष्ठा प्रदान करता है।

                                      

कविवर युगल किशोर प्रसाद
03.10.2007
न्यू विग्रहपुर
बिहारी पथपटना-1
मो0: +917352754585



                                                                          










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द्वापर गाथा
(महाकाव्य)
ध्रुव नारायण सिंह राई 

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महाकाव्य 
ध्रुव नारायण सिंह राई
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  महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई





द्वापर गाथा
 (महाकाव्य)
2012
ध्रुव नारायण सिंह राई


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भावांकुर
(कविता-संग्रह)
युगल किशोर प्रसाद
साहित्य: सिद्धांत
और विनियोग

युगल किशोर प्रसाद


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भारतीय मार्क्सवादी
आलोचक

युगल किशोर प्रसाद



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Sunday, February 27, 2022

ध्रुव नारायण सिंह राई की ग़ज़ल (सफ़र-ए-ज़िंदगी)


       सफ़र-ए-ज़िंदगी

                              (ग़ज़ल)
 

तय करना है साथ-साथ सफ़र-ए-ज़िंदगी

मुश्किलों में भी लगे सुहाना सफ़र-ए-ज़िंदगी

 

मुझको होगा दर्द, अगर तुमको काँटे चुभे

देह दो और जाँ एक होगी सफ़र-ए-ज़िंदगी

 

चलते-चलते थकी तो थाम लूँगा हाथ तेरा

ख़ुशी-ख़ुशी तय हो जायेगा सफ़र-ए-ज़िंदगी

 

हम होंगे न गुमराह चाहे जैसा हो ज़माना

ऐसा अर्मान-ए-इश्क़ मेरा सफ़र-ए-ज़िंदगी

 

चाहे जो भी हो जाये मुहब्बत कम नहीं होगी

हमेशा रहेगा ख़ुशनुमा सफ़र-ए-ज़िंदगी


ग़ज़ल सम्राट ध्रुव नारायण सिंह राई











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ध्रुव नारायण सिंह राई की ग़ज़ल (ये हसीं हँसी गर मिली है मुझको)

मैं आईना क्या देखूँ / ग़ज़ल- ध्रुव नारायण सिंह राई


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सुरेन्द्र भारती जी(गीतकार) के गीत चुपके से सनम तुम आ जाना


ग़ज़ल सम्राट ध्रुव नारायण सिंह राई की ग़ज़ल सफ़र-ए-ज़िंदगी का युटुब वीडियो 




Thursday, February 17, 2022

अँगूठा बोलता है (खण्डकाव्य), 1997, ध्रुव नारायण सिंह राई

 

अँगूठा बोलता है (खण्डकाव्य), 1997,

 ध्रुव नारायण सिंह राई द्वारा रचित खण्डकाव्य में छपी स्तुति

महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई


स्तुति


हे हर!

प्रशस्त कर जीवन-पथ,

सरल बने इति औ' अथ।

 

वसन्त नित, गंध मधुर,

सुभग सुमन-पराग-उर

सरसे, हे हर!

 

मोह मंद, ज्ञान जगे,

परम अर्थ, मद भागे,

सुलक्ष्य, हे हर!

 

वचन-अर्थ सहज, सती,

बने सदा, मिले सुमति

माते, हे हर!


स्तुति
अँगूठा बोलता है (खण्डकाव्य), 1997
ध्रुव नारायण सिंह राई



अँगूठा बोलता है (खण्डकाव्य), 1997,

ध्रुव नारायण सिंह राई 





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कविवर युगल किशोर प्रसाद / द्वापर गाथा (महाकाव्य) ध्रुव नारायण सिंह राई, 2012 का जीवन-मूल्य का वेब लिंक 




Saturday, February 12, 2022

महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई की कृतियाँ

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द्वापर गाथा
(महाकाव्य)
ध्रुव नारायण सिंह राई

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अँगूठा बोलता है (खण्डकाव्य), 1997,

 ध्रुव नारायण सिंह राई










द्वापर गाथा (महाकाव्य), 2012,
ध्रुव नारायण सिंह राई









Face of the mirror, 2003,
Dhruva Narayan Singh Rai
















महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई
    

ई. आलोक राई
शिक्षा-  बी.टेक.
इन मैकेनिकल इंजीनियरिंग,
पॉलिटेक्निक,
बी.एड.

मत भूलो रे मनवा

 (प्रेरणाश्रोत- महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई)

यादों में
अश्रु आये
आवाज भी
अन्दर रह जाये
ख्यालों में वो लम्हा
जब आये
अक्समात जब ऐसे कोई जाये
अवाक रह
सब सुन्न पड़ जाये
और कुछ कर न पाये
अब उनकी बातें याद आये
मेरे पिता
मेरे शिक्षक, मेरे मित्र
हर रिस्ते मेरे उनसे रहे
मेरे नम आँखों में
उनके लिए सदा प्यार है
फिर कभी किसी जन्म में
मुझे उनके साथ का इंतजार है
पहले जब मैं छोटा था
पापा ले जाते थे कवि सम्मेलनों में
बाल कवि बन मैं सुनाता था कविता
समय बितता गया
मैं शिक्षा के लिए बाहर रहा
छुट गयी मेरी कविता लेखनी
अब फिर मेरे अंदर
पिता “महाकवि ध्रुव नारायण सिंह राई”
की स्मृतियों से कविताए
आ रही हैं
मैं
पलट रहा हूँ
खोज रहा हूँ
देख रहा हूँ
उनकी वो सारे पन्ने
वे “गजल सम्राट”
जिनकी ढ़ेर सारी गजले
ऐहसास दिला रही
सफर ए जिंदगी का
अनुभव करा रही
जिंदगी के हर पहलुओं का
“राई” न रहे बेवश
मुश्किलों के सामने
“द्वापर गाथा” महाकाव्य
के विभिन्न प्रसंगों को निहार रहा हूँ
समझ रहा हूँ
“महाकाव्य” में लिखे
अंतिम शांति संदेश को
समझ रहा हूँ मैं
उस एकलव्य को
जो हर कमी से जुझ
बड़े प्रतिभा के धनी बने
जो है
“अँगूठा बोलता है” खण्डकाव्य
कई गीत, भजन को
मैं देख रहा हूँ
पत्रिकाओं की कृतिया पढ़ रहा हूँ
संकलनों में आये उनके
कृतियों को ध्यान दे रहा हूँ
सरस्वती बंदना उनकी मैं
गायन कर रहा हूँ
उनकी बाल सखी “चिलौनी नदी”
के पास से गुजरता रोज
उस कर्म धनी
के स्मरण से
खुद में उर्जा भरता
उस ध्रुव पथ पर
चलना चाह रहा हूँ
जिस पथ पर वो चले
शुक्रिया कर रहा हूँ
उनके साथ का
उनके सभी साथियों का
उनसे जुड़े सभी लोगों का
वो नैया थे मेरे
मैं था पतवार
हर डगर पर उनका था मुझपर
प्रेम बेसुमार
यादों के लम्हों में
डूब जाता हूँ
खुद को अकेला पाता हूँ
मत भूलो रे मनवा
मत भूलो
बाते उनकी मूझे आपको
याद दिलानी
इस बात को मुझे
फिर से है दोहरानी
..........................

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विनीता राई की युटुब पर विनीता द्वारा ग़ज़ल सम्राट ध्रुव नारायण सिंह राई जी के गजल का वाचन 👇

“द्वापर गाथा” महाकाव्य समकालीन युगधर्म से सम्पन्न एक काव्य-कृति-डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार

(पुस्तक समीक्षा) समकालीन युगधर्म से सम्पन्न एक काव्य-कृति “द्वापर गाथा” महाकाव्य -डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार           महाकाव्य साहित्य का स...